कविता
बेटा! मैं उंगलिओं पे गिन गिन के यहाँ दिन काट रहा हूँ
मैं तफ्तर से जब शाम को
बहुत थक हार कर लौटूं
नन्ही सी अपनी हथेलिया
मेरी आँखों पे रखकर
मासूमियत पूछती थी नाम अपना ही
मगर
काफूर हो जाती थी
सारी थकान दिन भर की /
फिर बड़े अधिकार से बेटा
मेरे जूतों के फीते खोल देता
बड़े शौक से निकालता था मेरे मोज़े
और कर देता था
सारे दिखावी बंधनों से मुक्त मुझको
फिर मेरे कन्धों पे बैठ जाता था
कभी पीठ पर मेरी बैठकर
मुझे घोड़ा बनाता था
फिर सुनाता था स्कूल के किस्से
कितने चाव से सुनता था मैं
सुबह होते ही मेरे पास आकर
गलबहियां डाल कर जगाता था
पापा! उठो सुबह हो गयी
मैं उठकर उसे तैयार करता था
स्कूल जाने के लिए
मगर अब मैं मसूरी में
यहाँ ट्रेनिंग पे आया हूँ
मगर नन्ही सी वो जान
अब भी हर शाम मेरा
दरवाजे पे इंतज़ार करती है
उसकी नन्ही सी दुनिया से
न जाने कितने दिनों के लिए
उसका घोड़ा चला गया
दबी सी रह जाती हैं
स्कूल की कितनी कहानियाँ
रो पड़ता है फोन पर
पापा तुम आओगे कब !
बहुत अब याद आती है
मैं ये कैसे कहूँ उससे
कि बेटा मैं भी तुझसे दूर
उंगलिओं पे गिन गिन के
यहाँ दिन काट रहा हूँ//
Monday, June 7, 2010
Posted by Surya Pal Gangwar at 11:01 AM
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